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वारिस पठान

हमने कितने बार देखा है की हिन्दू समाज हमेसा से ही धर्मनिरपेछता सिद्ध करता आया है, कहीं बाढ़ पीड़ितों को मंदिर में नमाज के लिए जगह देकर, तो कहीं मंदिर के देवी देवताओ के मूर्ति के बिच में अब्दुल कलाम जी का मूर्ति लगाकर. कई बार ये भी देखने को मिला है की मुशलमान समाज भी धर्मनिरपेछता साबित किया है. लेकिन कई बार आएसा लगता है की जितनी लचीलापन और आजादी हिन्दू समाज में है उतनी मुस्लिम समाज में नहीं है, मुस्लिम समाज में एक कट्टरता की झलक मिलती है, अगर कोई आगे बढ़कर कुछ करता है तो कोई न कोई मौलवी उसके नाम का फतवा निकाल देते है. चाहे वो ट्रिपल तलाक और हलाला जैसी कुरीतियों पर हो या कोई राजनीति उद्देस का हो.

 


ऐसा ही हाल में एक मामला आया है, जहाँ एक मुस्लिम विधायक को "गणपति बाप्पा मोरया" बोलने पर उस विधायक को बाद में माफ़ी मांगनी पड़ी, AIMIM के नेता वारिस पठान (विधायक) ने गणपति बाप्पा मौर्य कहने के कुछ ही दिनों में सार्वजनिक माफ़ी मांगी, जाहिर सी बात है की उन्होंने ये माफ़ी दबाव में आकर ही मांगी है.

Is Chanting 'Ganpati Bappa Morya' Un-Islamic? AIMIM MLA Waris Pathan Forced To Apoloigise

सवाल ये नहीं है की ये दबाव धार्मिक तौर पर है या राजनितिक, सवाल ये है की क्यों हर बार हिन्दू समाज धर्मनिरपेछता का परिचय देने के बाद भी भुद्धिजीवी और उदारवादी के निशाने पर रहता है और हर बार भगवा आतंकवाद के नाम से पुकारा जाता है, और मुस्लिम समाज में इतनी कट्टरता होते हुए भी क्यों हर बार उन्हें एक सहानुभूति की नजर से देखा जाता है. मैं कोई धर्म के खिलाफ नहीं हूँ, मैं सिर्फ इतना चाहता हूँ की अगर हिन्दू अपने मंदिर नमाज के लिए खोले तो कभी मुस्लिम अपने मस्जिद पूजा अर्चना के लिए खोले, अगर कभी हिन्दू मजार पर जाकर चादर चढ़ाये तो कभी कोई मुस्लिम गणेश चतुर्थी पर गणपति बाप्पा मौर्य कहे, और इसके लिए किसी को माफ़ी नहीं मांगना पड़े, नहीं तो क्या धर्मनिरपेक्षता की ताली एक हाथ से बजेगी?


यहां पर मे वो माफ़ी नामा वीडियो और कुछ ट्वीट्स शेयर कर रहा हूँ, जो आप चेक कर सकते है.